मुझे ज़मीन चाहिए, खुला आसमां चाहिए।
टुकडों टुकडों में नहीं, मुकम्मल जहां चाहिये।
यूं बेफिक्री का माहौल सा है,
न दोस्ती, ना किसी से अदावत है।
हर राह चलते मुसाफिर को,
गले लगाने की चाहत है।
किताबों में ढूंढता रहता हूं इलाज
इस बेकरार ओ बेमिज़ाज दिल का।
कहीं किसी पिछले वरक़ में छुपा
ख़त मिले मेरे क़ातिल का।
हर महफिल में मुफलिस हूं यारों,
अक्सर आंखें चुराता हूं दोस्तों से।
जिंदगी कट गई ढूंढते ढूंढते
बेघर हुआ इन्हीं पेचीदा रास्तों से ।
मुझे ज़मीन चाहिए, खुला आसमां चाहिए।
टुकडों टुकडों में नहीं, मुकम्मल जहां चाहिये।
। भावना।
20 Jan 2025
Leave a comment