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  • The Worst That Could Happen

    The worst that could happen
    is that the flowers would refuse to bloom.
    The moon would abandon the dark,
    and the rains would curl back into their cloud beds,
    leaving the fields thirsty.

    The worst that could happen
    is that rivers would not embrace the seas
    and keep to themselves,
    growing shallow and dry.
    The trees would hide their shade away,
    and the birds would forget to sing.

    If such things happened,
    we would still find each other,
    and Love,
    our love would still be enough
    to sustain the earth.

    And possibly,
    where love endures,
    flowers would bloom again, rivers would find the sea,
    and birds would remember their songs.


    4 Jun 2026

  • जहाँ शब्द चुपचाप रहते हैं

    कि कविताएं लिखने का मुझे नहीं ज़रा भी अभिमान हैं,
    क्योंकि घर मेरा ही कविताओं की मुफ़्त दुकान है।

    उल्लास भी यहीं, प्रेरणा भी यहीं,
    दिल चीरने वाली वेदना भी यहीं।
    घर की हर दीवार पर छपी हैं बातें,
    अलमारियों में कैद, दबे पाँव सिमटी यादें।

    वो देखो, थोड़ा बेरंग-सा, धूल चढ़ा हुआ,
    टकटकी लगाए कील पर झूलता एक चित्र।
    सालों पहले जन्मदिन पर मेरे, पाई-पाई जोड़कर,
    हैसियत से बड़ी दुकान से लाए थे मेरे मित्र।

    ये आईने का कैसा प्रेम है भला,
    कि माँ की सुर्ख़ बिंदियां चिपकी रहती है वहीँ।
    और दीवारों पर पेंसिलों से खुरची कद नापती लकीरें
    भागती बेलों-सी, धूप पकड़ने निकल चली है कहीं।

    केसर के कहवे की खुश्बू,
    बेरंग कैलेंडर की फ्रेम की हुई तस्वीर।
    सबको खुद-ब-खुद पता चलता हैं जनाब,
    अब हम नहीं बताते, हमारी सरज़मीन है कश्मीर।

    खनकती हँसी, सिसकती हिचकी या कोई शोरगुल,
    कहानियाँ, कविताएँ मुझे अक्सर पास बुलाती हैं।
    ना मैं कवि हूँ, ना कोई कहानीकार,
    दुनिया उधार देती है, उँगलियाँ कर्ज़ चुकाती हैं।

    । भावना ।
    04-12-2025

  • । हम दोनों ।

    । हम दोनों ।

    धूल चढ़ी डायरी के पिछले पन्ने
    में सिमटा हुआ मिला एक फूल।
    जिसकी अब खुशबू जुदा है,
    रंग भी मायूस सा है,
    पर उसे देखते ही,
    मेरे चेहरे पे झट से यूं आती है जो सुर्खी।
    कि याद आती है
    वो झुकी आंखों की कुछ बातें,
    न कटने वाली स्याह, लंबी रातें।
    वो बिन मतलब मुस्कुराना,
    और बातों बातों में, खामोश हो जाना।

    अब जिंदगी में कुछ ऐसे मसाइल है
    जिनकी पेचीदगी को सुलझाने में,
    अकेले पड़ गए दोनों।
    मुलाकातों में भर गई तन्हाईयां
    वो दिन कहाँ अब याद आते हैं।

    क्यों ना हम तुम इन्हीं रिश्तों के सहरा में,
    वो डायरी के फूल
    ज़मीं में बो दे साथ मिल के।
    जिन्हें छूने भर से ही
    मेरे गालों में हो सुर्खी,
    और तुम्हारी आंखों में भी,
    फिर वही शरारत सी आ जाए।

    । भावना ।
    4 Dec 2024

  • । एक ख़्वाहिश और ।

    मुझे ज़मीन चाहिए, खुला आसमां चाहिए।
    टुकडों टुकडों में नहीं, मुकम्मल जहां चाहिये।

    यूं बेफिक्री का माहौल सा है,
    न दोस्ती, ना किसी से अदावत है।
    हर राह चलते मुसाफिर को,
    गले लगाने की चाहत है।

    किताबों में ढूंढता रहता हूं इलाज
    इस बेकरार ओ बेमिज़ाज दिल का।
    कहीं किसी पिछले वरक़ में छुपा
    ख़त मिले मेरे क़ातिल का।

    हर महफिल में मुफलिस हूं यारों,
    अक्सर आंखें चुराता हूं दोस्तों से।
    जिंदगी कट गई ढूंढते ढूंढते
    बेघर हुआ इन्हीं पेचीदा रास्तों से ।

    मुझे ज़मीन चाहिए, खुला आसमां चाहिए।
    टुकडों टुकडों में नहीं, मुकम्मल जहां चाहिये।

    । भावना।
    20 Jan 2025

  • Daily Reflection

    In writing poetry
    I have to open past wounds
    Expose the blood, and bare the bones.
    These I offer as words
    As meter, rhyme and rhythm.

    And in that,
    Is the hope there is a part of me
    That becomes you.

    Now when the wound festers next
    Before I curl up in pain again
    We will share the agony.
    As you will share with others
    And all hold hands.

    That is my prayer
    With my pen in my hand today.

    Bhavna
    22 Jan 2025